परा गांव के अमन आश्रम में रामकथा : कुसंग का परिणाम अति भयंकर होता है :जगत गुरु
Ganesh Bhardwaj Wed, Oct 14, 2026
भिण्ड - संवाददाता
अटेर क्षेत्र के परा ग्रामान्तर्गत अमन आश्रम परिसर में चल रहे नौ दिवसीय श्रीरामकथा ज्ञानयज्ञ के चतुर्थ दिवस अनंतश्री विभूषित काशीधर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराजश्री ने कहा कि, कुसंग का परिणाम कितना भयंकर होता है, इसका उदाहरण कैकेयी के चरित्र से होता है। कैकेयी मंथरा की बातों पर विश्वास कर लेती है और वह प्रसन्न होकर के उसकी प्रसंशा करने लगती है। उसका परिणाम यह हुआ कि कैकेयी राम से ही विरोध कर बैठती है। कैकेयी बहुत समझदार थी लेकिन कुसंग के परिणामस्वरूप मंथरा की बातों में आकर के एक अबोध बालिका की तरह कुमार्ग में चली गई। कुमार्ग का परिणाम कितना भयावह होता है यह अज्ञान में मालूम नहीं होता है इसलिये शास्त्र का श्रवण किया जाता है जिससे पहले से जानकारी हो जाय कि कुमार्ग का फल क्या होता है। किसी को तकलीफ देना, किसी को सताना किसी के वस्तु का हरण कर लेना यह सब कुमार्ग का ही परिणाम है।
उत्तम ग्रंथ तथा महापुरुषों के जीवनव्रत मनुष्य को जीवन निर्माण के लिए प्रेरणा देते हैं। मनुष्य आत्मनिरीक्षण, संकल्प एवं अभ्यास द्वारा सद्गुणों का विकास करके जीवन को उज्ज्वल बना सकता है। समय का सदुपयोग पुरुषार्थ, सत्यनिष्ठा तथा आहार-विहार में सावधानी तथा विवेक का आदर मनुष्य के विवेक को उदात्त बनाते हैं। वास्तव में, अंहकार का क्षीण होना अर्थात अंहकार का उदात्तीकरण अथवा दिव्यिकरण जीवन का परम पुरुषार्थ है।
पूज्य शंकराचार्य जी ने कहा मनुष्य विषयों का भोगों का चिंतन करता है और चिंतन करने से विषयों की कामना पैदा हो जाती है कामना में विघ्न पड़ने पर क्रोध आ जाता है क्रोध उत्पन्न होने पर व्यक्ति हिंसक हो जाता है। जिसका परिणाम विद्रोह है। कामना भोगों का चिंतन करने से उनमें आसक्ति हो जाती है और आसक्ति ही सारे झगड़े की जड़ है। ज्ञानी पुरुषों का जो व्यवहार होता है वह अनासक्त होकर कर्म करते हैं। तथा फल में समत्व की भावना रखते हैं। इसीलिए श्रीराम वनवास होने पर आदर्श प्रस्तुत करते हैं। वह माता कैकेयी से कहते हैं महाराज की प्रतिज्ञा का पालन मैं अवश्य करूँगा। महाराज ने यह सब मुझसे क्यों नहीं कहा उनकी आज्ञा होने पर मैं सब कुछ कर सकता हूँ। अविलंब वन में चला जाऊंगा। माता तुम्हारा तो मुझपर पूरा अधिकार है अगर ऐसी बात थी तो मुझसे कह सकती थी। पिता जी से कहकर उनको कितना कष्ट में डाल दिया इससे जान पड़ता है तुम मुझको पराया समझती हो। माता जो होना था हो गया अब ऐसा प्रयत्न करो भरत राज्य का पालन करें पिता का सेवा करें मैं तो वन जाने के लिए तैयार हूँ। राम के वचन सुनकर के दशरथ के दुःख की सीमा नहीं रही, कुछ नहीं बोल सके रोने लगे। श्री राम द्वारा पिता की ऐसी दशा देखी नहीं गयी, कैकेयी की परिक्रमा किया माता-पिता को प्रणाम किया और कौशिल्या के भवन में पहुंच गए। भगवान श्री राम समाज में आदर्श प्रस्तुत करते हैं कि शिष्य का कर्तव्य गुरु के साथ कैसा होना चाहिए, पुत्र का कर्तव्य माता-पिता के साथ कैसा होना चाहिए। भाई का कर्तव्य भाइयों के साथ कैसा होना चाहिए। पति का कर्त्तव्य पत्नी के साथ कैसा होना चाहिए।
कैकेयी द्वारा श्रीराम का वनवास होने पर भी राम के मन में आदर का भाव था। जिससे समाज में प्रेरणा मिलती है कि किसी द्वारा स्वयं का अहित होने पर भी हमें उसकी निंदा नहीं करना चाहिए। निंदा करने से परिवार, समाज एवं राष्ट्र में टकराव होता है, जिसका परिणाम अशांति है। जीवन में अशांति आ जाने से संबंधित जन भी दुःखित होते रहते हैं।
ज्ञात हो कि उक्त कार्यक्रम का आयोजन नारायण सेवा समिति द्वारा किया गया है, जिसमें प्रतिदिन सैकड़ों भक्त पहुँचकर धर्म लाभ एवं भण्डारा प्रसाद प्राप्त कर रहे हैं।
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