: "चम्बल डकैतों नहीं, वीरों की धरा - रामकिशोर उपाध्याय

Admin Mon, Apr 25, 2022

केशव स्मृति सेवा न्यास भिण्ड द्वारा "मंथन-2022" के अन्तर्गत स्वाधीनता का अमृत महोत्सव विषय पर गोष्ठी का आयोजन

गणेश भारद्वाज - भिण्ड

हमारी चंबल की धरा स्वाधीनता संग्राम मैं हुए बलिदानियों से भरी हुई है उन्होंने कहा की स्वाधीनता के इतिहास को संकलित करते समय हमारे क्षेत्र के बलिदानीयों को उचित स्थान नहीं दिया गया हमें उनको याद कर इतिहास को पुनः संकलित करने की आवश्यकता है उक्त उद्गार कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भूतपूर्व सैनिक संघ के पूर्व अध्यक्ष सेवानिवृत्त सूबेदार मेजर राकेशसिंह जी, कार्यक्रम के अध्यक्ष वरिष्ठ अभिभाषक देवेन्द्र सिंह चौहान मुख्यअतिथि वरिष्ठ स्तम्भ लेखक पत्रकार एवं प्रखर वक्ता रामकिशोर उपाध्याय रहे । साथ ही न्यास के अध्यक्ष नवलसिंह जी भदौरिया भी मंचासीन रहे ।

1857 की स्वाधीनता समर में महारानी लक्ष्मी बाई के साथ हमारे चंबल क्षेत्र के हजारों बलिदानियों ने भाग लिया जिसमें भिंड जिले की बोहारा गांव के श्री ज्वाला सिंह, ककहारा के भगवंत सिंह, परा के गेंदा लाल दीक्षित, चीमा चमार एवं जंगली मंगली मेहतर, तेजपुरा के कुं. कल्याण सिंह, बझाई के रूप चंद्र पांडे आदि के साथ हजारों की संख्या में बलिदान हुए जिसको हमारे इतिहास में सम्मिलित नहीं किया गया वर्तमान में उन्हें उचित स्थान देते हुए हमारे युवा पीढ़ी को पढ़ाने की आवश्यकता है अतः पाठ्यक्रम में इन बलिदानीयों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए एवं हमारे क्षेत्र के राजमार्गों को इन बलिदानियों के नाम पर रखा जाए तो यह उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।
मुख्य वक्ता श्री रामकिशोर उपाध्याय ने अपने उद्बोधन में कहा की हम स्वाधीन तो हो गए हैं परंतु स्वतंत्र नहीं हुए हैं । अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति को स्वाधीनता का पहला समर कहा जाता है यदि वह पहला समर था तो महाराणा प्रताप द्वारा हल्दीघाटी का युद्ध क्या स्वाधीनता संग्राम नहीं था हमारे स्वाधीनता समर का प्रारंभ मोहम्मद बिन कासिम के साथ युद्ध के साथ ही प्रारंभ हो गया था परंतु स्वतंत्रता के पश्चात इतिहासकारों ने दोहरा मापदंड अपनाते हुए इतिहास को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जनरल डायर द्वारा जलियांवाला बाग में मारे गए हजारों नागरिकों की हत्या के कारण डायर को कातिल कहना ठीक है परंतु चित्तौड़गढ़ में 30000 मजदूरों की हत्या करने वाला अकबर महान बताया जाता है जबकि वह कभी महाराणा प्रताप को नहीं हरा सका एवं मेवाड़ की जीत का सपना लिए ही मर गया । चम्बल की भूमि वीरों की भूमि है महाराणा प्रताप के साथ हल्दी घाटी के युद्ध के प्रथम चरण में हमारे ग्वालियर के राजा रामराज के साथ चम्बल एवं भिण्ड के सैकडों सैनिक बलिदान हुये । इसी प्रकार महारानी लक्ष्मीबाई जब अंग्रेजों से लड़ते हुये भिण्ड होकर निकली तो भिण्ड के हजारों युवकों ने उनकी सेना के साथ प्राणों की आहुति दी । आज भी देश की सेना में भिण्ड जिले के हजारों यवक न केवल सीमा की सुरक्षा में लगे हैं बल्कि जिले के सैकड़ों सैनिकों ने बलिदानी दी है लेकिन आश्चर्य की बात है कि भिण्ड में डकैत संग्रहालय बनाने की बात हो रही है । जबकि यह चम्बल भूमि अमर बलिदानी रामप्रसाद विस्मल की जन्मभूमि भी है उनका पैत्रिक गांव बरबाई इसी चम्बल भूमि पर स्थित है । अमर सैनानी बटुकेश्वर दत्त को याद करते हुये श्री उपाध्याय ने कहा कि स्वतंत्रता के पश्चात स्वतंत्रता सैनानियों को जो सम्मान मिलना चाहिए थे वह नहीं मिला उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के पश्चात बटुकेश्वर दत्त जिन्हें शहीदे आजम भगतसिंह अपना गुरु मानते थे को बिहार की एक सिगरेट फैक्ट्री में काम करना पड़ा जहां उन्हें क्षय रोग हो गया फिर टूरिस्ट गाइड के रुप में काम किया और बाद में बस का परिमिट मांगने पर उनसे पहचान पत्र मांगा जाता है और अन्त में बीमारी के चलते दवाओं के अभाव में दम तोड़ दिया ।
स्वतंत्रता के पश्चात हमारा इतिहास हमारे शत्रुओं द्वारा लिखा गया जिसे तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत कर युवा पीढ़ी को भ्रमित किया गया है यह अवसर ऐसे अनिगिनत वीरों को याद कर उनका इतिहास नवीन पीढी को पढ़ाया जाये और उन्हें उचित सम्मान दिया जाये । हमारे युवाओं को अपने क्षेत्र के ऐसे गुमनाम बलिदानियों के साथ सेल्फी विद स्वतंत्रता सैनानी कार्यक्रम आयोजित कर नमन् करना चाहिए और शासन को मजबूर करना चाहिए कि उनका इतिहास भी पाठ्यक्रमों में सम्मिलित किया जाये ।
अतिथियों का स्वागत न्यास के सचिव श्री कैलाश नगरिया सुरेंद्र चौहान जगदीश दीक्षित ने किया आभार न्यास के सदस्य हर्षवर्धन जैन ने व्यक्त किया कार्यक्रम का सफल संचालन श्री रामानंद शर्मा ने किया।

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