राम कथा का पंचम दिवस, श्रोताओं ने राम रस गंगा में लगाई डुबकी, सुबह गुरु पूजन कार्यक्रम और श्रीराम यज्ञ विधिविज्ञान से हुआ आयोजित
भिण्ड - संवाददाता
भगवान श्रीराम का धर्म यज्ञशाला तक ही सीमित नहीं है। वह विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा भी करते हैं, अहिल्या का भी उद्धार करते हैं। भक्ति केवल मन्दिर तक ही सीमित नहीं है, भगवान राम जनमानस की समस्या का समाधान भी करते हैं। यह सब कर्म राम के लिए यज्ञ एवं भक्ति ही है। तभी वर्तमान समय में भी श्रीराम आस्था एवं श्रद्धा के केंद्र हैं। श्रीराम का जीवन चरित्र हमें प्रेरणा देती है कि हम सब को एकांकी नहीं बनना चाहिए है, क्योंकि राम के जीवन में एकांकीपन नहीं है। उनके अंदर समग्रता का समावेश है। तभी तो श्री राम का सम्पूर्ण जीवन ही यज्ञ है एवं अनुकरणीय है।
उक्त बातें पूज्यपाद अनन्तश्री विभूषित श्री काशीधर्मपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराज जी ने स्वरूप विद्या निकेतन, रेल्वे क्रॉसिंग के पास, अटेर रोड पर चल रहे नौ दिवसीय श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ के पञ्चम दिवस कही। महाराजश्री ने आगे बताया कि ब्रम्हर्षि विश्वामित्र यज्ञ रक्षणार्थ श्री राम व लक्ष्मण को लेकर जब वन से प्रस्थान कर रहे थे तब मार्ग में ताड़का राक्षसी मिल गयी। जिसका वध श्री राम ने किया, क्योंकि ताड़का अविद्या की मूर्ति है। जब तक अविद्या का संघार नहीं होता है और अविद्या का संघार चाहे ईश्वरीय ज्ञान से हो, चाहे शास्त्रीय ज्ञान से हो, महापुरुषों के उपदेश से हो तब तक धर्म और विश्व मानवता की रक्षा नहीं हो सकती है। विश्व व मानवता की रक्षा में हमेशा आतंकवाद व नक्सलवाद खतरा होता है। विश्व व मानवता की रक्षा के लिए इनका संघार जरूरी होता है।
पूज्य शंकराचार्य जी ने बताया कि जो लोग धर्म का संकीर्ण अर्थ करते हैं वह सेवा नहीं करते। धर्म बहुत व्यापक वस्तु है। जैसे अग्नि की जो दाहकता है वही उसका धर्म है और जल में जो आप्यायन शक्ति है तर कर देने की शक्ति है वही उसका धर्म है। अर्थात वस्तु में उसके वस्तुत्व की रक्षा करने वाला धर्म होता है क्योंकि उस वस्तु की रक्षा उसके धर्म के बगैर नहीं हो सकती। हममें और आपमें धर्म नामक वस्तु नहीं रहेगी तो हम और आप सुरक्षित नहीं रह पायेगें, मनुष्यता व मानवता सुरक्षित नहीं रह पाएगी।इसलिए सम्पूर्ण विश्व सृष्टि में एक धर्म है जिसका नाम है सनातन धर्म। किसी देश में एक काल में एक धर्म पैदा नहीं होता है। जो व्यक्ति मूलक धर्म होता है, परम्परा मूलक धर्म होता है और जो भूगोल मूलक धर्म होता है वो आपस में विषमता पैदा करती है। आज दुनिया के जितने साम्प्रदायिक धर्म हैं वो लड़ाई के केंद्र बिंदु बने हुए हैं। परन्तु सनातन धर्म सब जातियों में एक है, सब सम्प्रदायों में एक है, सब कालों में एक है वही धर्म का मूल है।
स्वामी जी ने बताया कि मारीच व सुबाहू दोनों अविद्या रूप ताड़का के पुत्र हैं। जो स्वयं अविद्या स्वरूप हैं। इनमें जो मारीच अविद्या है वो प्रपंच का प्रतीक है। मारीच माने मृगतृष्णा अर्थात मृगमरीचिका। जिसे तत्वज्ञान प्राप्त करना है उन्हें श्री राम की तरह विश्व प्रपंच को दूर फेक देना चाहिए। अगर प्रपंच की प्रतीति बनी रही तो वही मारीच आध्यात्मिक चेतना रूपी माता सीता को लुभाकर हरण करवाने में रावण का सहयोग करता है। और अविद्या का दूसरा पुत्र सुबाहु कर्मलिप्त कर देता है। उसके सामने दूसरे का कष्ट, मानवता का कष्ट, धर्म का यहां तक कि ईश्वर का भी ध्यान नहीं रहता है। जिव को ऐसा मोहित कर देता है जिस कारण से लोग स्वार्थ के होकर के स्वार्थ में आसक्त होते हैं और अपने बंधु बांधव से भी द्रोह कर लेते हैं। राम जी ने सुबाहू को मार दिया। इसलिए अज्ञान अर्थात अविद्या का संहार होने के बाद कहीं सत्कर्म होता है।